
वन्दे मातरम
भारत और ऑस्ट्रेलिया का मैच हमारे लिए सचिन के 17000 रनों की शौगात लाया मगर भारत फिर भी मैच हार गया ..........दर्शको को बहुत निराशा हुई . मगर इसी बीच एक ऐसी खबर आई जिसने हर उस बन्दे को झकजोर के रख दिया जो जुडा हुआ है अपनी आत्मा से ,जो जुडा हुआ है राष्ट्र प्रेम से जो जुडा हुआ है उसूलों से , जो बनाना चाहता है सच का प्रहरी .
खबर थी की राष्ट्र का अनमोल रत्न हिंदी भाषा का प्रहरी .पत्रकारिता का यश ..सत्य की वेदी का प्रहरी ..आदरणीय श्री प्रभाष जी जोशी ने अपना शरीर त्याग दिया है ...प्रभाष जी के बारे मैं शायद ही कोई ऐसा सज्जन हो नहीं जनता हो ..और मैं उनके बारे मैं क्या लिखूं मैं अभी इतना सामर्थ्य नहीं रखता हूँ की मेरी लेखनी उस महान आत्मा को प्रणाम के अलावा कुछ लिख पाए .........
उस दिन एक राष्ट्रीय समाचार पत्र की खबर थी की "कागद कारे अब कोरे ही रह जायेंगे ".......यह सोचने का विषय है ...
मुझे याद है की एक पत्रिका "द पब्लिक एजेंडा " मैं महात्मा गाँधी जी के ऊपर प्रभाष जी ने एक लेख लिखा "गाँधी तेरी पोथी पूजा के काम "
सभी विद्वानी जन जानते हैं की शरीर नष्ट होता है और प्रभाष जी का शरीर भी नष्ट हुआ है मगर अब हम उनके आदर्शों की पूजा करेंगे .. हम चौराहे पर एक मूर्ति लगा करा उस पर उनके जयंती और पुण्य तिथि मनाएंगे ..दीप जलाएंगे ,किसी का सम्मान करेंगे ,माल्यार्पण करेंगे , कार्यक्रम को अच्छी तरह पेश किया जायेगा .............और वही सब होगा जो आज गाँधी जी और उनकी पोथी के साथ हो रहा है .जो कि प्रभाष जी तो कभी नहीं चाहते थे
.सिर्फ पूजा की जायेगी
मैं यहाँ किसी की तुलना नहीं कर रहा मैं तो बस प्रभाष जी एक श्रद्धांजलि देने का प्रयास कर रहा हूँ अपने अंदाज़ मैं और शायद उस अंदाज़ मैं जो मैंने उनसे सीखा है ....
पत्रकारिता जगत की इतनी महान हस्ती थे के वे हमेशा पत्रकारों को उसूलों का पाठ पड़ाते रहे और मीडिया को उसकी भूमिका याद दिलाते रहे .....और जब भी जरुरत पड़ी भटकती हुई मीडिया को ,व्यापारी बन चुकी मीडिया को राह पर लाने कि उन्होंने कड़े शब्दों मैं आलोचना करते हुए मीडिया को राह पर लाने का प्रयत्न किया ...
आज जरुरत है प्रभाष जी याद करने की तो हमें कायम रखना होगा खुद को अपने उसूलों पर , हमें समझोता वादी प्रक्रिया से बचकर सत्य की लडाई जिन्दा रखनी होगी .कागद कारे लिखे जाये ...........उसमें वो लोग लिखे जो खुद के आदर्शों मैं प्रभाष जी को मानते हैं ....हमें अपने जीवन की दैनिक दिनचर्या मैं हर उस बात को शामिल करना होगा जो की एक स्वस्थ राष्ट्र की आवश्यकता है .प्रभाष जी का जीवन हमें हमें अपनी राह पर आगे बढने की प्रेरणा देगा ..हमें आत्म शक्ति प्रदान करेगा .. " कागद कारे" .......अब समाज की दिशा और दशा को आदर्शवादिता की ओर लाने हेतु गलियों मैं गांवों मैं और हर नुक्कड़ पर लिखे जायेंगे ....प्रभाष जी की कलम से लिखा हुआ हर शब्द हमें खुद को देखने का आइना प्रदान करता है...बस अ़ब यह सभ्य समाज पर निर्भर करता है कि वो उनकी पूजा करेगा या उनके आदर्शों का अनुशरण करके इस लडाई को जिन्दा रखेगा ..........
जो प्रभाष जी को पड़ता था या है वह एक बदलाव कि भावना अपने मन मैं अवश्य रखता है ऐसा मेरा मन कहता है ....मैं खुद उनसे कभी मिल नहीं पाया मगर मैंने हमेशा उन्हें अपने बीच पाया है .हमेशा उनके लेखों मैं उनके जीवन का सजीव चित्रण देखा है ....
इस भारतीय को यह विश्वास कि " कागद कारे " कभी कोरे राह ही नहीं सकते .
प्रभाष जी को सलाम जय हिंद
